ज्या परमसत्याचा आपण या संपूर्ण आयुष्यात बाहेरच्या जगात, विविध ठिकाणी जसे की मंदिरं, पुस्तकं, आणि नात्यांमध्ये शोध घेत आहोत, तो खरंच इतकं जवळ आहे की आपण त्याचा प्रत्यक्ष अनुभव घेऊ शकतो? खरंच तो प्रत्येकाच्या हृदयातच आहे का? विचार करा, जर ती अनंत शांती आणि प्रेम, ज्याचा आपण बाहेरील जगात शोध घेत आहोत, ती आधीपासूनच आपल्या आतच दडलेली असली तर?
सर्व धर्मग्रंथ, शास्त्र, गुरु, संत, ऋषि-मुनी यांनी हेच सांगितलं आहे की, परमेश्वर आपल्या आतच आहे. एक अशी वास्तविकता आहे, जिला अनेक नावांनी ओळखले गेले आहे. कोणी त्याला ‘ओम्’ म्हणतो, तर कोणीतरी ‘ब्रह्म’, ‘शिव’, ‘विष्णू’, ‘आत्मा’, ‘अल्लाह’, ‘गॉड’, ‘पिता’, ‘माता’, ‘हु’, ‘शब्द’, ‘ताओ’, ‘चेतना’ किंवा ‘जागरूकता’ म्हणतो. नाव काहीही असो, प्रत्येक नाव त्या अनंत चेतना आणि दिव्यतेकडे निर्देश करतो, जी आपल्या आतच आहे.
चला तर, जाणून घेऊ या या ब्रह्मांडाचं अद्वितीय सत्य.
“A Journey to Inner Peace.”
दिलचस्प बात यह है कि सभी धर्म और आध्यात्मिक दर्शन उस एक सत्य को विभिन्न नामों से पुकारते हैं—ओम्, ब्रह्म, आत्मा, अल्लाह, भगवान, पिता, माता, ताओ, चेतना, आदि।
सूची लंबी है, लेकिन सभी नाम जिस दिशा की ओर इशारा करते हैं, वह एक ही है।
सभी साधु-संत, चाहे वे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख या अन्य हों, ने कहा है कि सत्य आपके अंदर ही है, लेकिन आप इससे अनजान हैं।
अब उस अनुभव को प्राप्त करें। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता है जिसे आप अभी महसूस कर सकते हैं!
निचे दिए गए वीडियो को देखकर आप इस ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य को समझ पाएंगे।
उन्हें अनुभव हुआ होगा इसलिए उन्होंने इसका जिक्र किया है.
किसी भी सिद्धांत के अस्तित्व के लिए कोई न कोई अनुभव अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
सिद्धांत हवा में नहीं बनते। कहीं न कहीं किसी को कुछ न कुछ अनुभव जरूर हुआ होगा.
हर किसी का कहने का तरीका अलग-अलग होता है.
तो, उस चेतना का अनुभव करें जो आपके भीतर है, उस सर्वोच्च वास्तविकता का जिसकी ओर दुनिया भर के हर धर्म, धर्मग्रंथ, संत और ऋषि ने इशारा किया है।
स्वयं अनुभव करें और पुष्टि करें कि इसका अस्तित्व है या नहीं!
न अन्तःप्रज्ञम्। न वहिःप्रज्ञम्। न उभयतःप्रज्ञम्। न प्रज्ञानधनम्। न प्रज्ञम्। न अप्रज्ञम्। अदृष्टम् अव्यवहार्यम् अग्राह्यम् अलक्षणम् अचिन्त्यम् अव्यपदेश्यम् एकात्मप्रत्यसारं प्रपञ्चोपशमम् शान्तं शिवम् अद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते विवेकिनः । सः आत्मा सः विज्ञेयः ॥
वह न अन्तःप्रज्ञ है न बहिष्प्रज्ञ है, न उभय-प्रज्ञ अर्थात् अन्तः एवं बहिष्प्रज्ञ एक साथ है, न वह प्रज्ञान-घन है, न प्रज्ञ (ज्ञाता) है, न अप्रज्ञ (अज्ञाता)। वह जो अदृष्ट है, अव्यवहार्य है, अग्राह्य है, अलक्षण है, अचिन्त्य है, अव्यपदेश्य अर्थात् अनिर्देश्य है, ‘आत्मा’ के ऐकान्तिक अस्तित्व का बोध ही जिसका सार है, ‘जिसमें’ समस्त प्रपञ्चात्मक जगत् का विलय हो जाता है, जो ‘पूर्ण शान्त’ है, जो ‘शिवम्’ है-मंगलकारी है, और जो ‘अद्वैत’ है, ‘उसे’ ही चतुर्थ (पाद) माना जाता है; ‘वही’ है ‘आत्मा’, एकमात्र ‘वही’ ‘विज्ञेय’ (जानने योग्य तत्त्व) है।
क्या परमात्मा केवल एक विश्वास है या यह एक वास्तविकता है, जिसे अनुभव किया जा सकता है?
अगर परमात्मा को अनुभव किया जा सकता है, तो यह एक सिद्धांत नहीं बल्कि वास्तविकता है।
इस सर्वोच्च वास्तविकता को अनुभव करके आप हर प्रकार के दुख से मुक्ति पा सकते हैं।